बात है.....मुलायम और मुलायम कि साइकिल की... आप लोगों को मालूम ही होगा कि 2007 में गुंडागर्दी के आरोपों के बाद ही पार्टी और सेनापती मुलायम सिंह को लगा कि उनके पैरो तले जमीन निकल जाएगी ... इससे भी बढ कर यह लगा होगा कि अब सत्ता हाथो से निकल जाए.. तो तब किया होगा.. इस घटना से उनके और पार्टी के सभी सदस्यो में फुट आ चुका था... कहते है न समय बलवान होता है.. समय गुजरा और मुलायम को लगा की इस पार्टी को नए सेनापती की आवश्यकता है.. तभी मुलायम ने अपने इके (अखिलेश) को राजनीति में उतारने का फैसला कर लिया....और अखिलेश ने राजनीति में आते ही मीडिया और जनता का ध्यान अपने तरफ किया कहते है न कि पहले बोल में छक्का... जब पार्टी ने बाहुबली नेता डीपी यादव को शामिल करने का फैसला किया तो अखिलेश ने बिना कोई देर किए उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया। डीपी यादव को मोहन सिंह और आजम खां जैसे वरिष्ठ पार्टी नेताओं का समर्थन था लेकिन अखिलेश को पता था कि साल 2007 में गुंडार्दी के आरोपों के बाद ही पार्टी सत्ता से बाहर हुई थी। इसलिए उन्होंने कठोर फैसला लेते हुए डीपी को बाहर का रास्ता दिखा दिया... इस से पार्टी और अखिलेश दौनो को फायदा पहुचा... आप को बता दें कि अखिलेश उतना तो नही बोलते मगर जब कहते है तो सुनने वालों का जमावड़ा लग जाता है.. इस से युवा उनसे प्रेरीत हुए और उनके झोली युवाओं का वोट गया और कुछ उनके लुभावने वायदें का भी कमाल था कि वह आज यूपी के मुख्यमन्त्री बन गए.....
यह था कुछ वायदें और कुछ सख़्त कदम उठाने का नतिजा........
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