Saturday, 11 October 2014

भाषा के भंवर में..

देश का एक तबका राजनीति दांव-पेंच के खेल में व्यस्त है, और वहीं संजय लीला भंसाली द्बारा निर्मित और ओमंग कुमार द्बारा निर्देशित फिल्म 'मैरीकॉम’ को भाषा के बेगानेपन का सामना करना पर रहा है। फिल्म को अपनी ही जन्म भूमि पर जगह नहीं मिल सकी । देशभर के लगभग 1,8०० सिनेमाघरों में पांच सितम्बर को रिलीज हुई 'मैरीकॉम’। रिलीज होने से पहले ही फ़िल्म को कई राज्य जैसे महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में टैक्स फ्री कर दिया गया, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इस फ़िल्म को देखें और एक साहसी लड़की के जीवन और संघर्ष को देख-समझ सकें।
 जब देश में भाषा की लड़ाई जनता को अलग-थलग कर देती है, तब अजनबियत और कटुता ही हासिल होती है। यही दुर्भाव मैरीकॉम फ़िल्म के पीछे लग गए। मैरीकॉम के गृह प्रदेश मणिपुर में इस फ़िल्म के प्रदर्शन पर लगी रोक को लेकर बहस चल रही है, कुछ लोग हिदी सिनेमा को शक्तिशाली संचार माध्यम बताते हुए इस पर रोक को अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बता रहे हैं। मणिपुर में रिवोल्यूशनरी पीपुल्स फ्रंट नामक विद्रोही संगठन ने राज्य में 2००० के उसी सितंबर महीने में यह रोक लगाई थी, जिसमें देश हिदी दिवस,हिदी सप्ताह और हिदी माह मनाता है। मणिपुर में तभी से वह प्रतिबंध लागू है। इस दौरान मणिपुर की या केंद्र की सरकारों ने या सामाजिक-राजनीतिक संगठनों ने इस पाबंदी को हटवाने का कोई प्रयास नहीं किया।
 प्रंट का आरोप है कि हिदी फ़िल्मों की पहचान भारत सरकार की व्यस्था की तरह है। भारत सरकार का मणिपुर के साथ सौतेला, भेदभाव वाला व्यवहार है। फ्रंट से संबद्ध अलगाववदियों की राय में हिदी की मसाला फ़िल्में मणिपुर के समाजिक मूल्यों के खिलाफ हैं। मणिपुर के लोग मैरीकॉम फ़िल्म में भी भेदभाव का आरोप लगाते हैं, क्योंकि इनमें मैरीकॉम की केंद्रीय भूमिका में मणिपुर अथवा पूर्वोत्तर की किसी अभिनेत्री को नहीं लिया गया है। वे पूछते हैं कि मणिपुर में क्या अभिनेत्रियों की कमी है ? 'मैरीकॉम’ ने रिलीज के पहले दिन ही 8 करोड़ रुपए से ज्यादा कमा कर बड़े पर्दे पर कामयाब रही है। अपने राज्य मणिपुर में नहीं दिखाए जाने से एम सी मैरीकॉम बेहद निराश हैं। उन्हीं के जीवन पर आधारित है यह फिल्म। वे मानती हैं कि खेल ही सबको प्यार में बांध सकता है। यह फ़िल्म अलग-थलग रहे देश के पूर्वोत्तर राज्यों की जनता को देश की मुख्यधारा से जोड़ने में मददगार साबित हो सकती थी।

जॉनी लीवर फिर 'लाइव’

जॉनी लीवर जाने-माने कामेडियन तो हैं, यह सभी जानते हैं। बीएम देसाई, याकूब, महमूद, जॉनीवाकर, ओमप्रकाश, आगा से असरानी तक हास्य कलाकारों की हिंदी फिल्मों में लंबी परंपरा रही है। उसमें करीब डेढ़ दशक से जॉनी लीवर ने अपनी जगह बनायी और उस पर डटे रहे हैं। उनका अपना एक दर्शक वर्ग है। पर कैरियर उन्होंने स्टेज शो करके शुरू किया था। 8० के दशक में उनके 'हंसी के हंगामें’ कैसेट बेहद लोकप्रिय हुए थे। उस जमाने में भी स्टेज पर कामेडी करके इतनी ऊंची पायदान पर पहुंचना कठिन था। लगभग हर बड़े शहर में ऐसे कलाकार होते थे। उन्हें 'वो मिमिक्री करने वाला’ के रूप में जाना जाता था। पर मुंबई के लोगों ने दो घंटे वाले इस हंसोड़ कलाकार को पसंद किया और जब उनका कैसेट आया तो वह हाथों हाथ बिक गया। इसकी बदौलत उनकी ख्याति मुंबई से निकलकर दूरदराज तक पहुंची। हजारों लोग मुंबई में उनके कामेडी शो में पहुंचते और मिमिक्री और चुटकुलों का मजा लूटते थे। पीछे बज रहे ड्रम पर उनका माइकल जैक्सन की स्टाइल में थिरकना लोगों का जी खुश कर देता था।
 स्टेज से उठकर वे फिल्मों में पहुंच गए और सिनेमा से ऐसे मुब्तिला हुए कि फिर कि स्टेज शो करने की फुरसत क्या उनके बारे में सोचना भी कठिन हो गया। एक के बाद एक फिल्म। उन्होंने तब यह भी सोचा कि एक साथ दो काम करने से अच्छा है एक ही करो और उसमें अपना सौ प्रतिशत दो। लिहाजा बालीवुड में वे बंधे रहे। अब 16 साल बाद फिर वे स्टेज पर हैं। 'जॉनी लीवर लाइव’ नाम के इस कार्यक्रम की शुरुआत तीन महीने पहले हुई। ढाई घंटे का यह कार्यक्रम पिछली बार मुंबई के नेशनल सेंटर फॉर परफार्मिंग आर्ट्स में हुआ जहां यादों में धूमिल पड़ गयी 'हाउसफुल’ की तख्ती फिर लगानी पड़ी।
 मुंबई, चेन्नई के अलावा कई शहरों में शो हो चुके हैं और वे सिल्वर जुबली शो की तरफ बढ़ रहे हैं जो उम्मीद है इसी साल होगा। जॉनी कहते हैं कि मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे फिल्मों में सफलता मिली और इन शो में भी। लेकिन इनके लिए कॉफी मेहनत करनी पड़ती है। मनोरंजन, मसाला, हास्य के साथ लोगों को जानने-समझने-देखने से मिला अनुभव सब कुछ आजमाना होता है। उन्हें फूहड़ता से परहेज है। वे कहते हैं दूसरे अगर दो अर्थी संवाद बोलते हैं तो उन्हें मुबारक। मैं तो ऐसा नहीं कर सकता। साफ-सुथरा हास्य मेरा मकसद है। मैं ध्यान रखता हूं कि कोई यह न कहे कि 'अरे इसने बच्चों, फैमिली के सामने यह क्या कह दिया।’
 जॉनी को अमेरिका, कनाडा आदि से भी वहां शो करने के अनुरोध मिल रहे हैं पर उनका सिद्धांत है, 'काम आराम से करूंगा क्योंकि मुझे अपनी फैमिली को भी देखना है।’ दिलचस्प यह है कि उनकी लड़की जिम्मी वैसे तो पढ़ाई पूरी करके बिजनेस के क्षेत्र में जाना चाहती थी पर उसे भी कामेडी का चस्का लग गया है। जॉनी ने उसकी रुचि देखकर उसे दस मिनट दिये तो उसने बहुत तालियां बटोरीं। यह सिलसिला आगे बढ़ा। लीवर को तब बेहद खुशी होती है जब कोई उनसे कहता है 'देखना जॉनी भाई आपकी लड़की आपसे आगे जाएगी।’ उनसे शो में कुछ आइटम कामेडियन गौरव शर्मा भी देते हैं, और लेखक किरण कोरटियाल संचालन करते हैं। अपने शो में उन्हें ऐसे भी लोग मिलते हैं जो अपने युवा बेटे का परिचय कराते हुए कहते हैं कि 'जब हम आपके शो पहले देखते थे, तब यह बच्चा अपनी मां के पेट में था।’ जॉनी का ध्येय है कि लोगों को हमेशा हंसाते जाना है। इसमें वे प्राणप्रण से लगे हुए हैं।

खान-पान और आन-बान


आम तौर पर देखा जाता हैं कि, घर के बड़े बुजुर्ग बाज़ार में बिकने वाली खाने-पीने की तली-भुनी चीजों को खाने से हमेशा रोकते रहते हैं, और घर में भी ज्यादातर उन चीजों को लाने से परहेज करते है। उनकी मानें तो ये चीजें हमें बीमार करती हैं। इनका शरीर पर खराब असर पड़ता है। यह तो घर-बाहर की बात हुई। देश-दुनिया में भी खाने-पीने को लेकर मामला अजीबोगरीब ही है। कब कहां किस कारण किसी चीज पर रोक लगा दी जाए कह नहीं सकते। फ्रांस को ही लीजिए सरकार ने टमाटर केचप के इस्तेमाल पर इस कारण पाबंदी लगा दी क्योंकि उनके हिसाब से केचप उनकी संस्कृति के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा था। यही नहीं उनकी मशहूर फ्रेंच फ्राइज़ का स्वाद केचप बेस्वाद कर रहा था। उनके अनुसार इससे न सिर्फ आने वाली पीढ़ी पर इसका गलत प्रभाव पड़ता बल्कि स्थानीय लोग फ्रेंच फ्राइज़ का असली जायका भी भूल जाते। 2०11 में सख्त कदम उठाते हुए फ्रांस सरकार ने प्राइमरी स्कूलों में टमाटर केचप को दिन के भोजन में परोसने को कानूनी रूप से प्रतिबंधित कर दिया। इसके कुछ महीने बाद ही 3 अक्टूबर 2०11 में ब्रिटिश अखबारद्बारा छापे गए एक लेख ने बताया कि फ्रांस के स्कूलों के लिए कानून बनाया गया है कि कुछ दिनों के लिए बच्चों को प्रोटीन डाइट के लिए मांसाहार भोजन दें। इस कानून से शाकाहारी भोजन पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं लगा। सरकार का मानना था कि स्थानीय कैंटीन को खाना परोसने के अलावा भी यहां के प्रसिद्ध व्यंजन के बारे में अपने ग्राहकों को कुछ अनोखी बातें बतनी चाहिए। कृषि एंव खाद्य मंत्री ब्रूनो ले मेरे कहते हैं की फ्रांस अपने भोजन की गुणवत्ता के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं।
 ऐसी कुछ विचित्र बातें समोसे के लिए कही जाती हैं। सोमाली चरमपंथी समूह अल शबाब द्बारा समोसे को ईसाई देशों से करीबी समझा जाता है और फ्राइड तिकोने आकार वाली वस्तु को भी एक ईसाई मुल्क से जुड़ी हुई वस्तु मानते हैं। संबुसस (समोसे) को खाना या बेचना दोनों पर ही सोमाली में रोक लगा दी गई है। इसी तरह कुछ समय से सुर्खियों में छायी खाप पंचायत भी खान-पान को लेकर आनबान का फच्चर फंसाने में पीछे नहीं। 2०12 में उनकी ओर से कहा गया था की चाऊमीन का सेवन करने से मानव शरीर में कई तरह से हार्मोनल असंतुलन होता है जिस कारण बलात्कार जैसी घटनाएं राज्यों में बढ़ी हैं। इसी से मिलता-जुलता तर्क भी कुछ दिनों तक लोगो की जुबान पर चढ़ा रहा कि जो मांसाहरी है वे भी जिम्मेदार होते हैं रेप के लिए।

मंगाइये, खाइये!

इस भागदौड़ भरी जिन्दगी को समय की चाल के साथ जोड़ने के लिए लोगों ने अपने स्वास्थ्य को नजरअंदाज कर दिया है, जिसका असर सीधे तौर पर उनके खान-पान के समय पर पड़ता है। पैक्ड फूड जल्दी खाने में और कई किस्म के पैक्ड खाने को झटपट बनाने का एक आसान विकल्प बन गया है। लेकिन वे पुराने दिन थे, जब किसी को खाना बनाने का मन न हो और वह भूखा रह जाए, या कोई पार्टी करनी हो तो वह सर का दर्द बन जाए। तकनीकी क्षेत्र में हुए बदलाव ने अपने साथ मनुष्य के रहन-सहन को भी बदल दिया है। जितनी जल्दी मनुष्य खाना बना नहीं सकता उतनी ही जल्दी अगर खाना उसके घर उम्दा पैकिंग के साथ आ जाए वह और भी महज एक फोनकॉल से। हां, अब यह मुमकिन है। लोगों ने इसे अपना समय बचाने की प्रक्रिया की तरह अपना भी लिया है।
 इस पेशे ने न केवल अपनी सुविधा लोगों तक पहुंचाई, बल्कि अपने व्यापार को एक हजार करोड़ तक भी पहुंचाया है। देश में कोई ऐसा रेस्टोरेंट नहीं है जो पैक्ड फूड घर वितरण न करता हो। छोटे से छोटे रेस्टोरेंट भी इस प्रणाली से आज अछूते नहीं हैं। बदलती ग्राहकों की पसंद और एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा में आगे रहने के लिए किफायती दरों पर वितरण प्रणाली की सुविधा देते हैं, इस पेशे से जुड़े जानकारबताते हैं कि इस तरह के विकल्प को लोग समय के साथ अपने जीवन में जोड़ते जा रहे हैं। यह प्रणाली पिछले कुछ सालों में बड़ी जनसंख्या का हिस्सा बन गई है और इसके कारोबार में बीते वक्त के साथ बढ़ोतरी हुई है। इंडिया मैकडी के अनुसार यह प्रणाली 3० से 4० प्रतिशत के पार हो जाएगी और लगभग छह सौ करोड़ की बढ़त बना लेगी। शहरों के विस्तार के साथ-साथ रहन-सहन में आए बदलाव ने लोगों के भोजन के तरीकों को भी बदल कर रख दिया है। इस प्रणाली के दो सार्थक कारक है एक तो स्पीड दूसरा खाने की गुणवत्ता। झटपट तैयार किया खाना और उसमें पांच तारा स्वाद। मोटे तौर पर इसमें 7०० से 8०० करोड़ का इजाफा हर एक साल होता है जो कि 15 से 2० प्रतिशत है। एक गृहिणी ने बताया की इस तरह की पैक्ड फूड की वस्तुएं पारिवारिक जीवन को आसान बना दिया है अब कुछ मिनटों में कई लोगों के लिए इडली-सांबर बना सकती हूं। वे खुद सप्ताह में करीब पांच दिन पैक्ड फूड का इस्तेमाल करते हैं।

पल-पल आगे बढ़

देश-विदेश में एक समय किसी भी ऊंची और भव्य इमारत की पहचान उस पर लगी क्लॉकहाउस (घंटाघर) के जरिए हुआ करती थी, लेकिन बदलते समय के साथ-साथ इसके मायने भी बदल गए हैं। इसका अनोखा उदाहरण भारत के अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में देखने को मिला, जहां विक्टोरिया क्लॉकहाउस का उपयोग छात्रों को नियमित रूप से समय के सदुपयोग के लिए कराया जा रहा है। युवाओं के मार्गदर्शन के लिए नए-नए तरीकों से उनका ध्यान शिक्षा की ओर खींचा जा रहा है और यह तरीका भी उनमें से एक है। यह बच्चों में उत्पन्न होने वाले आलस्य और ज़िद्दीपन को कम करने में मदद कर रही है। कभी-कभी यह सवाल भी निकल के आता है कि क्या यह घंटाघर छात्रों के व्यवहार को बदलने में वाकई कारगर है। एएमयू से नामीगिरामी छात्रों की फेहरिस्त लंबी है, जैसे मोहम्मद अली, लियाकत अली खान, अब्दुल गफ्फार खान, शेख अब्दुल्ला, हामिद अंसारी, राजा राव, ख्वाजा अहमद अब्बास, अली सरदार जाफरी, शहरयार, ईश्वरी प्रसाद, मुशीरुल हसन, जहूर कासिम, मोनिस रजा, लाला अमरनाथ, जफर इकबाल, नसीरुद्दीन शाह, जावेद अख्तर और मुजफ्फर अली। यह सूची देखकर तो जवाब हां ही होना चाहिए।
 ब्रिटिश परोपकारी जोसफ बेक ने एएमयू के संस्थापक सर सैयद अहमद खान को 1891 में क्लॉकहाउस दान में दिया था। उन्होंने सोचा था कि वह समय के महत्व के बारे में भी अनिच्छुक छात्रों को समझा सकता है। क्लॉकहाउस को सेंट्रल एंट्री प्वाइंट पर लगाया गया इसके घंटे कीआवाज को एक किलोमीटर दूर तक सुना जा सकता है। यह स्पोर्ट्स, लाइब्रेरी, लेबोरेटरी और कक्षा में पढ़ रहे बच्चों को बतलाता है कि उनकी कक्षा का समय हो गया है और दूसरी कक्षा में जाने का समय आ गया है। माना जाता है कि ज्यादातर बच्चे अपने खाली समय को बिना कुछ किये ही बर्बाद कर देते हैं, जोकि काफी समय से कालेज प्रशासन के लिए समस्या थी। कहीं न कहीं कोई भूल है, और इस बात का एहसास था कि विश्वविद्यालय के शैक्षणिक काम में कुछ कमी है। ऐसा कोई तरीका चाहिए जो बच्चों को सही समय का मूल्यांकन कराए। इन्हीं सब बातों को देखते हुए कई बार एएमयू के कुलपति खराब घंटाघर पर चढ़कर मुआयना किया करते थे और फिर उसी दौरान उन्होंने सख्त कदम उठाते हुए पुराने घंटाघर को ठीक करवाने का फैसला किया। प्रोफ़ेसर इफ्तिखार आलम खान के अनुसार इस घंटाघर की कीमत 4००० रुपए (उस समय के हिसाब से) बताई गई, लेकिन आज के समय में इसकी असल कीमत चार लाख आंकी जाती है। इसको सही तरीके से लगाने में लगभग 3० साल लग गए थे, क्लॉक की टिक-टॉक का अलग महत्व बन गया था वहां पढ़ने वाले स्टूडेंटों के बीच, यह घड़ी निरंतर जताती रहती थी कि भविष्य को सुधारना है तो समय के एक-एक क्षण का सदुपयोग किया जाना चाहिए। इस तरह के व्यहवार को कार्यगत कराने के लिए लेफ्टिनेंट जनरल ज़मीरुद्दीन शाह कुलपति (वीसी) ने क्लॉकहाउस को ठीक कराने का जिम्मेदारी प्रो-वाईस-चांसलर ब्रिग. सैयद अहमद अली को दी और कुछ समय के बाद गुजरात के इंजीनियर की मदद से इससे बदल कर नया रूप दे दिया गया और पुराने विक्टोरिया क्लॉकहाउस के हिस्सों को विश्वविद्यालय के संग्रहालय में प्रदर्शनी के लिए रख दिया गया। यह क्लॉक दो भागों में है, आगे और पीछे, जिसकी आवाज दिन के समय 8०० गज की दूरी तक सुनाई पड़ती है और रात के समय बढ़ करएक किलोमीटर तक हो जाती है।

कचरे के दिन भी फिरेंगे

कचरा आज सबसे बड़ी परेशानी बन गया है। देश का ऐसा कोई भी राज्य नहीं, जो कचरे को सही जगह ठिकाने लगाने की समस्या से न जूझ रहा हो। कचरे के कारण कई शहरों की कई लाख हेक्टर जमीन लैंडफिल के तौर पर इस्तेमाल किये जाने लगी है, जिससे उस शहर का नक्शा ही बदल गया। पहले जिन शहरों को उनकी खूबसूरती के लिए जाना जाता था, आज कचरे के कारण वे बदसूरत हो गए हैं। ऐसा एक उदाहरण है कर्नाटक के बंगलुरु शहर का जो लगभग कई सालों से गंदगी और कूड़े-कचरे को सही जगह ठिकाने लगाने की समस्या से जूझ रहा है, सरकार द्बारा कई जगह खाली जमीन को कचरा इकट्ठा करने के रूप में इस्तेमाल में कर रहीे है जिससे उस प्रदेश के लोगों के लिए काफी परेशानी का माहौल उत्पन्न हो गया है। जिधर भी ऩजर जाती है वहां सिर्फ कचरा ही कचरा। स्थानीय लोगों ने आसपास की जमीन पर कचरा डम्प किये जाने के विरोध में सड़कें जाम कर दीं। सरकार आनन-फानन में मामला शांत कराने के लिए दूसरे गांव में सारा कचरा और वहां की जमीन का इस्तेमाल करने लगी है। लेकिन आशंका है कि वहां भी विरोध शुरू न हो जाए। सरकार द्बारा अनुमान पर अनुमान लगाए जा रहे थे, दूसरी तरफ तटीय कर्नाटक के पुत्तुर तालुके के दक्षिण में कन्नडा जिले के सभी गांव प्लास्टिक का इस्तेमाल करने के बावजूद आने वाले दिनों में वह देश का पहला प्लास्टिक मुक्त गांव होने जा रहा है। यही नहीं बल्कि खुद के द्बारा पैदा किये गये प्लास्टिक के कचरे को पर्यावरण संरक्षण के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
 संभवत: पुत्तर पंचायत का बेल्लारे ग्राम प्लास्टिक के कचरे से डीजल के समकक्ष ईंधन तैयार करने वाली परियोजना को अपने यहां लागू करने वाला पहला गांव बनने जा रहा है। प्लास्टिक को ईंधन में बदल देने वाली प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनी 'ऐल्टानॉल टेक्नोलॉजी’ के सहनिदेशक सतीश नारायण स्वामी और डा बाबू के लिए भी यह थोड़ा हैरान करने वाला रहा। शहरों के मुकाबले गांवों ने इसमें ज्यादा बढ़-चढ़ कर भाग लिया। देश का पहला संयंत्र भी वहीं लग रहा है।
 अनुमान है कि 25 लाख की लागत वाले इस संयंत्र से लगभग 5०० किलोग्राम प्लास्टिक कचरे का शोधन करके 25० लीटर से ज्यादा ईंधन बनाया जा सकेगा। प्लास्टिक के ईंधन बनाने की यह तकनीक पूरी तरह से देसी है, जिसे भारतीय इंजीनियरिंग का नया दौर कहा जा सकता है। सह-निदेशक सतीश बताते हैं कि वह शुरुआती दौर से ही कचरा प्रबंधन से संबंधित परियोजना से जुड़े रहे हैं और उन पर काम करते आ रहे हैं। प्लास्टिक से ईंधन बनाने की उम्मीद को उन्होंने जगाए रखा और लगभग नौ साल तक इस काम में वे जुटे रहे। उन्होंने और उनके साथी डा बाबू ने वैज्ञानिक तरीके से पर्यावरण का ध्यान रखते हुए कचरा प्रबंध के लक्ष्य के साथ दो साल पहले इस कंपनी की शुरुआत की। इस तकनीक से आने वाले वर्षों में कचरा प्रबंधन की रूपरेखा पूरी तरह से बदल जाएगी। नगर निगमों और पंचायतों के लिए कचरा एक समस्या न होकर संसाधन और आमदनी का जरिया बन जाएगा और साथ ही साथ यह एक नए रोजगार के रूप में उजागर होगा। यह आने वाले समय में स्वच्छ पर्यावरण का बेहतर उपाय होगा।

साल भर बनता है तिरंगा ...........

यह तिरंगा हमारा वह प्रतीक है जो हर भारतवासी के सिर को गर्व से उन्नत कर देता है। स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस नजदीक आते ही बाजार भी तिरंगे के रंग में रंगे नजर आते हैं। लहराते हुए झंडे को देख कर हममें अपनी देशभक्ति के प्रति भावना ओर भी जोर मारती है। इतिहास के पन्ने यदि पलटें तो मालूम होगा की पहली बार तीन रंग वाला ध्वज सन19०6 में बंगाल के बँटवारे के विरोध में निकाले गए जलूस में शचीन्द्र कुमार बोस ने लाया था और वहीं से तिरंगा ने राष्ट्रीय ध्वज का रुप ले लिया। लेकिन ज्यादातर भारतीय इस बात से अनजान हैं कि कैसे राष्ट्रीय ध्वज को बनाया जाता है और उसे किन लोगों द्बारा तैयार किया जाता हैं। और कौन इन तिन रंगो को तय करता है जो हमारे राष्ट्रीय ध्वज को निखारता है?
 कर्णाटक के हुबली में ही ये मानक तिरंग बनते हैं। वहां खादी और ग्रामीण उद्योग आयोग द्बारा अधिकृत ग्रामोद्योग संयुक्त संघ ही इन राष्ट्रीय ध्वजों को तैयार करता है। यहां के गांव के लोगों की रोजी-रोटी ही तिरंगा है। संघ के पास हुबली और बागलकोट जिले में करीब सवा सौ ग्रामीण हैं जो साल भर लगातार तिरंगा बनाते हैं। एक बार तैयार हुए ध्वज की जांच करके इनकी सिलाई की मजबूती और रंग को नाप कर बनाने वाले मजदूर को एक मध्यमआकार के ध्वज के बदले 2० रुपए दिए जाते हैं। इन कारीगरों को मानक ब्यूरो द्बारा दिये गए आकार के हिसाब सेही तिरंगे बनाने पड़ते हैं। तिरंगा बनाने वाले कारीगर महीने में 16,००० रुपए के करीब कमा लेते है। जो प्रति दिन के अधिकृत मजदूरी से कहीं ज्यादा है।
 उस जगह काम कर रहे लोग यह मान कर काम नहीं करते है कि उन्हें पैसे कमाने हैं, बल्कि राष्ट्रीय ध्वज बनाने में वे गौरव महसूस करते हैं। झंडे की सिलाई विभाग में लगभग 25 लोग काम करते हैं जो कपडे को काटने, स्टीम प्रेसिग और छपाई का काम करते है। झंडा खादी का बनाया जाता है। खादी बुनने में केवल कपास, रेशम और ऊन का ही प्रयोग किया जाता है।
 इसकी बुनाई भी सामन्य बुनाई से भिन्न होती है। इस तरह की बुनाई अब दुर्लभ हो गई है। धारवाड़ के निकट गदग और कर्नाटक के बागलकोट में खादी की बुनाई की जाती है और 'हुबली' एकमात्र लाइसेंस प्राप्त संस्थान है जहां से झंडा उत्पादन व आपूर्ति की जाती है। बुनाई से लेकर बाजार में पहुंचने तक कई बार बीआईएस प्रयोगशालाओं में इसका परीक्षण होता है। बुनाई के बाद सामग्री को परीक्षण के लिए भेजा जाता है। कड़े गुणवत्ता परीक्षण के बाद उसे वापस कारखाने भेज दिया जाता है। इसके बाद उसे तीन रंगो में रंगा जाता है। बीच वाली पट्टी के ठीक मध्य में अशोक चक्र को काढ़ा जाता है। उसके बाद इसे फिर परीक्षण के लिए भेजा जाता है। बीआईएस झंडे की जांच करता है इसके बाद ही इसे बाजार में बेचने के लिए भेजा जाता है।

तिरंगी हैं सोशल साइट्स ...............

देश प्रेम की बातें तो आपने किताबों, कहानियों और फ़िल्मों में देखी-सुनी और पढ़ी होंगी। आपने भी महसूस कर अपनी भावनाएं अभिव्यक्त की होंगी। इंटरनेट के युग में अब देशप्रेम की भावना की अभिव्यक्ति कुछ अनोखे अंदाज मे देखने-समझने को मिल रही है। गुजरते वक्त के साथ खुशियों को ज़ाहिर करने का अंदाज भी एक-सा नहीं रहता, बदल ही जाता है। इस बार 15 अगस्त को लेकर लोगों में कई तरह का रोमांच और उत्साह देखने को मिल रहा हैं। एक तरफ सोशल नेटवîकग साइट्स पर स्वतंत्रता दिवस को यादगार बनाने की होड़ लगी है तो वहीं दूसरी तरफ इसी तर्ज पर चैटिंग मैसेंजर के यूजर्स में भी यह सिलसिला शुरू हो गया है।
 स्वतत्रंता दिवस के उत्साह को लेकर सोशल साइट फ़ेसबुक के यूज़र महिप का कहना है कि लोगों ने अपने प्रोफाइल आईडी के वॉलपेपर को बदल कर तिरंगा या उसी से जुड़ी ऐसी फोटो को लगा दी हैं जिनसे वह अपने देश प्रेम की भावना को ज़ाहिर कर अपने दोस्तों तक राष्ट्रभक्ति का संदेश दे सकें। अगर बात चैटिंग मैसेंजर की करें तो आप अपने ही स्मार्ट फोन के मैसेंजर बॉक्स को देखकर यह अंदाजा लगा सकते हैं कि देशप्रेम अब लोगों के दिलों में सीमित न रहकर सोशल नेटवîकग साइट्स पर भी छाया हुआ है। सोशल नेटवर्क साइट्स पर आम लोगों की पकड़ अब दिन-प्रतिदिन मज़बूत होती जा रही है।
 एक अनुमान के मुताबिक फ़ेसबुक पर भारतीय उपयोगकर्ताओं की संख्या सौ करोड़ से भी ज्यादा आंकी जा रही है और 15 अगस्त के अवसर पर लगभग 75 प्रतिशत लोगों ने अपने प्रोफाइल और कवर फोटो में तिरंगा झंडा लगाकर देश प्रेम की भावना का इजहार कर रहे हैं। यह आलम न केवल देश में रहने वाले भारतीयों तक सीमित है बल्कि विदेशों में रह रहे भारतीय मूल के नागरिकों में भी यही जज़्बा देखने को मिल रहा है। बच्चों से लेकर वृद्ध और युवा सभी इस तरह के सोशल नेटवîकग साइट्स का उपयोग कर रहे हैं। देखा-देखी उनके दिलों में भी देश भक्ति का ज्वार उफन रहा है।
 आप बड़ी आसानी से अपनी प्रोफाइल से जुड़े दोस्तों के वॉलपेपर को देखकर इसकी अहमियत का अनुमान लगा सकते हैं कि आज सोशल नेटवîकग साईट्स और चैटींग मैसेंजर सुख-दुख के पलों को सांझा करने का कितना लोकप्रिय चलन बन गया है। इससे हट कर कुछ ऐसे स्टेटस भी पोस्ट हो रही हैं जो इन साइटों पर सबसे ज्यादा पसंद किया जा रहा है 'जय जवान जय किसान’ कुछ लोगों द्बारा देशप्रेम की कविता को भी पोस्ट किया जा रहा है। ट्विटर पर यह सिलसिला थोड़ा-सा हटकर है लेकिन मुख्यतौर पर यह भी लोगों को आपस में जोड़े रखने का काम करता है। ट्विटर पर देश प्रेम केवल एक प्रोफाइल तक सीमित न होकर फॉलो करने के कमाल से एक ही क्लिक के साथ ट्विटर के सभी एकाउंट होल्डर्स से अपना संदेश दिखाया जा सकता है। देश की नामी-गिरामी हस्तियां भी इससे पीछे नहीं हैं।