कचरा आज सबसे बड़ी परेशानी बन गया है। देश का ऐसा कोई भी राज्य नहीं, जो कचरे को सही जगह ठिकाने लगाने की समस्या से न जूझ रहा हो। कचरे के कारण कई शहरों की कई लाख हेक्टर जमीन लैंडफिल के तौर पर इस्तेमाल किये जाने लगी है, जिससे उस शहर का नक्शा ही बदल गया। पहले जिन शहरों को उनकी खूबसूरती के लिए जाना जाता था, आज कचरे के कारण वे बदसूरत हो गए हैं। ऐसा एक उदाहरण है कर्नाटक के बंगलुरु शहर का जो लगभग कई सालों से गंदगी और कूड़े-कचरे को सही जगह ठिकाने लगाने की समस्या से जूझ रहा है, सरकार द्बारा कई जगह खाली जमीन को कचरा इकट्ठा करने के रूप में इस्तेमाल में कर रहीे है जिससे उस प्रदेश के लोगों के लिए काफी परेशानी का माहौल उत्पन्न हो गया है। जिधर भी ऩजर जाती है वहां सिर्फ कचरा ही कचरा। स्थानीय लोगों ने आसपास की जमीन पर कचरा डम्प किये जाने के विरोध में सड़कें जाम कर दीं। सरकार आनन-फानन में मामला शांत कराने के लिए दूसरे गांव में सारा कचरा और वहां की जमीन का इस्तेमाल करने लगी है। लेकिन आशंका है कि वहां भी विरोध शुरू न हो जाए। सरकार द्बारा अनुमान पर अनुमान लगाए जा रहे थे, दूसरी तरफ तटीय कर्नाटक के पुत्तुर तालुके के दक्षिण में कन्नडा जिले के सभी गांव प्लास्टिक का इस्तेमाल करने के बावजूद आने वाले दिनों में वह देश का पहला प्लास्टिक मुक्त गांव होने जा रहा है। यही नहीं बल्कि खुद के द्बारा पैदा किये गये प्लास्टिक के कचरे को पर्यावरण संरक्षण के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
संभवत: पुत्तर पंचायत का बेल्लारे ग्राम प्लास्टिक के कचरे से डीजल के समकक्ष ईंधन तैयार करने वाली परियोजना को अपने यहां लागू करने वाला पहला गांव बनने जा रहा है। प्लास्टिक को ईंधन में बदल देने वाली प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनी 'ऐल्टानॉल टेक्नोलॉजी’ के सहनिदेशक सतीश नारायण स्वामी और डा बाबू के लिए भी यह थोड़ा हैरान करने वाला रहा। शहरों के मुकाबले गांवों ने इसमें ज्यादा बढ़-चढ़ कर भाग लिया। देश का पहला संयंत्र भी वहीं लग रहा है।
अनुमान है कि 25 लाख की लागत वाले इस संयंत्र से लगभग 5०० किलोग्राम प्लास्टिक कचरे का शोधन करके 25० लीटर से ज्यादा ईंधन बनाया जा सकेगा। प्लास्टिक के ईंधन बनाने की यह तकनीक पूरी तरह से देसी है, जिसे भारतीय इंजीनियरिंग का नया दौर कहा जा सकता है। सह-निदेशक सतीश बताते हैं कि वह शुरुआती दौर से ही कचरा प्रबंधन से संबंधित परियोजना से जुड़े रहे हैं और उन पर काम करते आ रहे हैं। प्लास्टिक से ईंधन बनाने की उम्मीद को उन्होंने जगाए रखा और लगभग नौ साल तक इस काम में वे जुटे रहे। उन्होंने और उनके साथी डा बाबू ने वैज्ञानिक तरीके से पर्यावरण का ध्यान रखते हुए कचरा प्रबंध के लक्ष्य के साथ दो साल पहले इस कंपनी की शुरुआत की। इस तकनीक से आने वाले वर्षों में कचरा प्रबंधन की रूपरेखा पूरी तरह से बदल जाएगी। नगर निगमों और पंचायतों के लिए कचरा एक समस्या न होकर संसाधन और आमदनी का जरिया बन जाएगा और साथ ही साथ यह एक नए रोजगार के रूप में उजागर होगा। यह आने वाले समय में स्वच्छ पर्यावरण का बेहतर उपाय होगा।
संभवत: पुत्तर पंचायत का बेल्लारे ग्राम प्लास्टिक के कचरे से डीजल के समकक्ष ईंधन तैयार करने वाली परियोजना को अपने यहां लागू करने वाला पहला गांव बनने जा रहा है। प्लास्टिक को ईंधन में बदल देने वाली प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनी 'ऐल्टानॉल टेक्नोलॉजी’ के सहनिदेशक सतीश नारायण स्वामी और डा बाबू के लिए भी यह थोड़ा हैरान करने वाला रहा। शहरों के मुकाबले गांवों ने इसमें ज्यादा बढ़-चढ़ कर भाग लिया। देश का पहला संयंत्र भी वहीं लग रहा है।
अनुमान है कि 25 लाख की लागत वाले इस संयंत्र से लगभग 5०० किलोग्राम प्लास्टिक कचरे का शोधन करके 25० लीटर से ज्यादा ईंधन बनाया जा सकेगा। प्लास्टिक के ईंधन बनाने की यह तकनीक पूरी तरह से देसी है, जिसे भारतीय इंजीनियरिंग का नया दौर कहा जा सकता है। सह-निदेशक सतीश बताते हैं कि वह शुरुआती दौर से ही कचरा प्रबंधन से संबंधित परियोजना से जुड़े रहे हैं और उन पर काम करते आ रहे हैं। प्लास्टिक से ईंधन बनाने की उम्मीद को उन्होंने जगाए रखा और लगभग नौ साल तक इस काम में वे जुटे रहे। उन्होंने और उनके साथी डा बाबू ने वैज्ञानिक तरीके से पर्यावरण का ध्यान रखते हुए कचरा प्रबंध के लक्ष्य के साथ दो साल पहले इस कंपनी की शुरुआत की। इस तकनीक से आने वाले वर्षों में कचरा प्रबंधन की रूपरेखा पूरी तरह से बदल जाएगी। नगर निगमों और पंचायतों के लिए कचरा एक समस्या न होकर संसाधन और आमदनी का जरिया बन जाएगा और साथ ही साथ यह एक नए रोजगार के रूप में उजागर होगा। यह आने वाले समय में स्वच्छ पर्यावरण का बेहतर उपाय होगा।
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