देश का एक तबका राजनीति दांव-पेंच के खेल में व्यस्त है, और वहीं संजय लीला भंसाली द्बारा निर्मित और ओमंग कुमार द्बारा निर्देशित फिल्म 'मैरीकॉम’ को भाषा के बेगानेपन का सामना करना पर रहा है। फिल्म को अपनी ही जन्म भूमि पर जगह नहीं मिल सकी । देशभर के लगभग 1,8०० सिनेमाघरों में पांच सितम्बर को रिलीज हुई 'मैरीकॉम’। रिलीज होने से पहले ही फ़िल्म को कई राज्य जैसे महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में टैक्स फ्री कर दिया गया, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इस फ़िल्म को देखें और एक साहसी लड़की के जीवन और संघर्ष को देख-समझ सकें।
जब देश में भाषा की लड़ाई जनता को अलग-थलग कर देती है, तब अजनबियत और कटुता ही हासिल होती है। यही दुर्भाव मैरीकॉम फ़िल्म के पीछे लग गए। मैरीकॉम के गृह प्रदेश मणिपुर में इस फ़िल्म के प्रदर्शन पर लगी रोक को लेकर बहस चल रही है, कुछ लोग हिदी सिनेमा को शक्तिशाली संचार माध्यम बताते हुए इस पर रोक को अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बता रहे हैं। मणिपुर में रिवोल्यूशनरी पीपुल्स फ्रंट नामक विद्रोही संगठन ने राज्य में 2००० के उसी सितंबर महीने में यह रोक लगाई थी, जिसमें देश हिदी दिवस,हिदी सप्ताह और हिदी माह मनाता है। मणिपुर में तभी से वह प्रतिबंध लागू है। इस दौरान मणिपुर की या केंद्र की सरकारों ने या सामाजिक-राजनीतिक संगठनों ने इस पाबंदी को हटवाने का कोई प्रयास नहीं किया।
प्रंट का आरोप है कि हिदी फ़िल्मों की पहचान भारत सरकार की व्यस्था की तरह है। भारत सरकार का मणिपुर के साथ सौतेला, भेदभाव वाला व्यवहार है। फ्रंट से संबद्ध अलगाववदियों की राय में हिदी की मसाला फ़िल्में मणिपुर के समाजिक मूल्यों के खिलाफ हैं। मणिपुर के लोग मैरीकॉम फ़िल्म में भी भेदभाव का आरोप लगाते हैं, क्योंकि इनमें मैरीकॉम की केंद्रीय भूमिका में मणिपुर अथवा पूर्वोत्तर की किसी अभिनेत्री को नहीं लिया गया है। वे पूछते हैं कि मणिपुर में क्या अभिनेत्रियों की कमी है ? 'मैरीकॉम’ ने रिलीज के पहले दिन ही 8 करोड़ रुपए से ज्यादा कमा कर बड़े पर्दे पर कामयाब रही है। अपने राज्य मणिपुर में नहीं दिखाए जाने से एम सी मैरीकॉम बेहद निराश हैं। उन्हीं के जीवन पर आधारित है यह फिल्म। वे मानती हैं कि खेल ही सबको प्यार में बांध सकता है। यह फ़िल्म अलग-थलग रहे देश के पूर्वोत्तर राज्यों की जनता को देश की मुख्यधारा से जोड़ने में मददगार साबित हो सकती थी।
जब देश में भाषा की लड़ाई जनता को अलग-थलग कर देती है, तब अजनबियत और कटुता ही हासिल होती है। यही दुर्भाव मैरीकॉम फ़िल्म के पीछे लग गए। मैरीकॉम के गृह प्रदेश मणिपुर में इस फ़िल्म के प्रदर्शन पर लगी रोक को लेकर बहस चल रही है, कुछ लोग हिदी सिनेमा को शक्तिशाली संचार माध्यम बताते हुए इस पर रोक को अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बता रहे हैं। मणिपुर में रिवोल्यूशनरी पीपुल्स फ्रंट नामक विद्रोही संगठन ने राज्य में 2००० के उसी सितंबर महीने में यह रोक लगाई थी, जिसमें देश हिदी दिवस,हिदी सप्ताह और हिदी माह मनाता है। मणिपुर में तभी से वह प्रतिबंध लागू है। इस दौरान मणिपुर की या केंद्र की सरकारों ने या सामाजिक-राजनीतिक संगठनों ने इस पाबंदी को हटवाने का कोई प्रयास नहीं किया।
प्रंट का आरोप है कि हिदी फ़िल्मों की पहचान भारत सरकार की व्यस्था की तरह है। भारत सरकार का मणिपुर के साथ सौतेला, भेदभाव वाला व्यवहार है। फ्रंट से संबद्ध अलगाववदियों की राय में हिदी की मसाला फ़िल्में मणिपुर के समाजिक मूल्यों के खिलाफ हैं। मणिपुर के लोग मैरीकॉम फ़िल्म में भी भेदभाव का आरोप लगाते हैं, क्योंकि इनमें मैरीकॉम की केंद्रीय भूमिका में मणिपुर अथवा पूर्वोत्तर की किसी अभिनेत्री को नहीं लिया गया है। वे पूछते हैं कि मणिपुर में क्या अभिनेत्रियों की कमी है ? 'मैरीकॉम’ ने रिलीज के पहले दिन ही 8 करोड़ रुपए से ज्यादा कमा कर बड़े पर्दे पर कामयाब रही है। अपने राज्य मणिपुर में नहीं दिखाए जाने से एम सी मैरीकॉम बेहद निराश हैं। उन्हीं के जीवन पर आधारित है यह फिल्म। वे मानती हैं कि खेल ही सबको प्यार में बांध सकता है। यह फ़िल्म अलग-थलग रहे देश के पूर्वोत्तर राज्यों की जनता को देश की मुख्यधारा से जोड़ने में मददगार साबित हो सकती थी।
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