Tuesday, 2 June 2015

बढ़ता कदम पॉजिटिव सोच की ओर...


बजुर्गो ने सही कहा है दवा से ज्यादा काम दुआ करती है। दुआ से तात्पर्य है पॉजिटिव एनर्जी। उदाहरण के तौर पर हम देख सकते है कि देश में हालिया आए लोकसभा चुनावो के परिणामों ने देश के नागरिकों के सामने एक सकारात्मक पहलू पेस किया। प्रधानमंत्री पद के प्रमुख दावेदार के रूप में श्री नरेन्द्र मोदी जी को। जब हर तरफ यह लगने लगा था कि देश का अब कुछ नहीं हो सकता, वहीं भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने न केवल एक उम्मीद जगाने में कामयाब रहे,बल्कि कई युवाओं के लिए सपने भी बुनने का काम किया।राजनीतिक गलियारों से लेकर खेल के मैदान तक सकारात्मक सोच ने कई लोगों के लिए ऐसे और अनोखे एक्साम्प्ल पेस किया। सायद ही किसी ने अपनी वास्तविक जिंदगी में सोचा हो।

गांधी जी का कहना था...

अपनी जिंदगी का एक लक्ष्य बनाकर चलें तो दिमाग को भटकने से बचाया जा सकता है। किसी भी अप्रिय स्थिति का सारा दोष खुद पर ही न मढ़ लें। इसके लिए परिस्थितियां भी दोषी हो सकती हैं। आपकी काबिलियत इसमें है कि आप इन परिस्थितियों को खुद पर हावी न होने दें और खुद में सकारात्मकता का संचार करें। इसमें आपके करीबी दोस्त व रिश्तेदार आपकी मदद कर सकते हैं।'

एक प्रसिद्ध कहानी की मद्द से सकारात्मक बातों को समझा जा सकता है..

एक ऋषि के दो शिष्य थे| जिनमें से एक शिष्य सकारात्मक सोच वाला था वह हमेशा दूसरों की भलाई का सोचता था और दूसरा बहुत नकारात्मक सोच रखता था और स्वभाव से बहुत क्रोधी भी था| एक दिन महात्मा जी अपने दोनों शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए उनको जंगल में ले गये|

जंगल में एक आम का पेड़ था जिस पर बहुत सारे खट्टे और मीठे आम लटके हुए थे| ऋषि ने पेड़ की ओर देखा और शिष्यों से कहा की इस पेड़ को ध्यान से देखो| फिर उन्होंने पहले शिष्य से पूछा की तुम्हें क्या दिखाई देता है|  शिष्य ने कहा कि ये पेड़ बहुत ही विनम्र है लोग इसको पत्थर मारते हैं फिर भी ये बिना कुछ कहे फल देता है| इसी तरह इंसान को भी होना चाहिए, कितनी भी परेशानी हो विनम्रता और त्याग की भावना नहीं छोड़नी चाहिए| फिर दूसरे शिष्य से पूछा कि तुम क्या देखते हो, उसने क्रोधित होते हुए कहा की ये पेड़ बहुत धूर्त है बिना पत्थर मारे ये कभी फल नहीं देता इससे फल लेने के लिए इसे मारना ही पड़ेगा|  इसी तरह मनुष्य को भी अपने मतलब की चीज़ें दूसरों से छीन लेनी चाहिए| गुरु जी हँसते हुए पहले शिष्य की बढ़ाई की और दूसरे शिष्य से भी उससे सीख लेने के लिए कहा|

मानव  कई प्रकार की समस्याओं पर विजय पाने में सक्षम रहा ,लेकिन फिर भी कई बार वह असहाय  महसूस करता है क्यूँ ?  नकारात्मक सोच एक बड़ी वजह मानी जा सकती है । नकारात्मक सोच आपके नज़रिए को बदल देता है जिससे आपका काम और व्यक्तिगत जीवन दोनों प्रभावित होता है और नतीज़तन आपकी प्रगति बाधित होती है।

सकारात्मक सोच का संबंध सिर्फ आपके और आप के करियर से ही नहीं है,बल्कि यह आपके पारिवारिक जीवन और सामाजिक जीवन से भी जुड़ा है। नकारात्मक शक्ति एक तरह की चुबंक प्रणाली की तरह काम करती है वह आपको और आप के आस-पास की समाजीक माहौल को भी प्रभावित करती है। साथ ही गलत विचार वाले व्यक्ति अपने आसपास एक ऐसा नकारात्मक माहौल बना लेते हैं। जो उनके साथ-साथ उनके आसपास के लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा अपना असर छोड़ देता है।

कभी आप ने अंदाजा लगाया होगा कि जब आप जीवन या फिर भविष्य के प्रति पॉजिटिव बातें करते हैं तो बहुत से लोग आपकी ओर आकर्षि‍त होते हैं वहीं अगर आप हर समय जीवन के नेगेटिव पहलुओं को ही याद करते रहते हैं तो हर कोई आप से नजरे चुराना चाहेगा।

जीवन से जुड़ी अपेक्षाएं पूरी न होने पर निराशा स्वाभाविक है लेकिन अगर आप उस निराशा के अंधेरे में ही डूबे रहेंगे तो आशा की दूसरी किरणों को पहचान भी नहीं पाएंगे। याद कीजिए फिल्म थ्री इडियट्स में आमिर खान का वह जुमला-‘ऑल इज वैल’ (सब सही होगा/या फिर सब सही है) जो की लम्बें समय तक लोगों के जुबान पर सिंहासन लगाए विराजमान था।


आमिर इस फिल्म में कहते भी हैं कि यह जुमला कहने का यह मतलब नहीं कि सारी परेशानियां खत्म हो गईं। बल्कि इसे बोलने का मकसद तो हमारे सामने पेश आने वाली परेशानियों से लड़ने की ताकत हासिल करना है।

जीवन में उतार-चढ़ाव आना लाजमी है। लेकिन आपके असल व्यक्तित्व की पहचान आपके उस रवैये से है जो आप परेशानियों में घिरा होने पर अपनाते हैं। कुछ लोग जीवन के सकारात्मक पहलुओं को ढूंढ-ढूंढ कर अपनी जिंदगी में उत्साह बरकरार रखते हैं और कुछ लोग नकारात्मकता से इस कदर घिर जाते हैं कि कोई गलत कदम उठाने से भी नहीं चूकते।

मानव ने कई प्रकार की समस्याओं पर विजय पा ली,लेकिन फिर भी वह असहाय  है नकारात्मक/नेगेटिव शक्ति के बीच। मगर जिंदगी के दो पहलू है एक सकारात्मक और दूसरा नकारात्क। मनुष्य जीवन में कई दफा मुश्किलों ने अपनी चाल बदली और मानव जाति पर साये की तरह उसके आस-पास ही मंडराती रहती है,कई बार देखने मॆं आया इन पेचीदगी के कारण मनुष्य के व्यवहार में बहुत सारे ऐसे विकट परिवर्तन देखने को मिली जिससे न केवल उसकी छवी खरब हुई बल्कि उसके जीवन में नकारात्म शक्ति ने जगह बना कर उस पर हावी होती रही। दुख मनुष्य से ऐसे-ऐसे काम करवा लेता है, जो वह होश में रहकर तो कभी नहीं करना चाहेगा। दुख मनुष्य के अंदर विचलन लाता है। इसलिए मनुष्य को अपनी ऊर्जा को संचय कर सकारात्मक कामों में लगाना चाहिए।

अगर मनुष्य अपने विचारों को पॉजिटिव के मधुर नीर में पिरो दे तो यह एक शुऱूआत हो सकती है,किसी भी रूके काम को एक सकारात्मक सोच के साथ शुरू करने की। अगर सोच जेसी रहेगी आप से वेसे लोगों का जुड़ना भी लगा रहेगा। कहते न की सोच पर दुनिया चलती है उसी पर इसकी बदलाव की नीव भी रखी जाती है और उसी तरह सकारात्मक विचार रखने वाले आपसे जुड़ना पसंद करेंगे।भारतीय संस्कृति में खुशी वास्तुशास्त्र और फेंगशुई का चलन बढ़ा। वाकई, घर में सकारात्मक शक्तियों के फैलाव से खुशहाली पनपती है। आज के दौर में लोगों का वास्तुशास्त्र और फेंगशुई के प्रति रुझान काफी बढ़ गया है।

एक पॉजिटिव एनर्जी मनुष्य के व्यवाहार के साथ उसके स्वास्थ को भी लाभ पहुचाता है-

आयु में बढ़ोतरी

उदासी में कमी

हृदय रोग में कमी

जिस समय आप नेगेटिव चीजों में भी पॉजिटिव पक्ष का आकलन करना सीख जाएंगे उस दिन कोई भी रुकावट आपका मनोबल गिराने में सफल नहीं हो पाएगी।


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