Saturday, 11 October 2014

साल भर बनता है तिरंगा ...........

यह तिरंगा हमारा वह प्रतीक है जो हर भारतवासी के सिर को गर्व से उन्नत कर देता है। स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस नजदीक आते ही बाजार भी तिरंगे के रंग में रंगे नजर आते हैं। लहराते हुए झंडे को देख कर हममें अपनी देशभक्ति के प्रति भावना ओर भी जोर मारती है। इतिहास के पन्ने यदि पलटें तो मालूम होगा की पहली बार तीन रंग वाला ध्वज सन19०6 में बंगाल के बँटवारे के विरोध में निकाले गए जलूस में शचीन्द्र कुमार बोस ने लाया था और वहीं से तिरंगा ने राष्ट्रीय ध्वज का रुप ले लिया। लेकिन ज्यादातर भारतीय इस बात से अनजान हैं कि कैसे राष्ट्रीय ध्वज को बनाया जाता है और उसे किन लोगों द्बारा तैयार किया जाता हैं। और कौन इन तिन रंगो को तय करता है जो हमारे राष्ट्रीय ध्वज को निखारता है?
 कर्णाटक के हुबली में ही ये मानक तिरंग बनते हैं। वहां खादी और ग्रामीण उद्योग आयोग द्बारा अधिकृत ग्रामोद्योग संयुक्त संघ ही इन राष्ट्रीय ध्वजों को तैयार करता है। यहां के गांव के लोगों की रोजी-रोटी ही तिरंगा है। संघ के पास हुबली और बागलकोट जिले में करीब सवा सौ ग्रामीण हैं जो साल भर लगातार तिरंगा बनाते हैं। एक बार तैयार हुए ध्वज की जांच करके इनकी सिलाई की मजबूती और रंग को नाप कर बनाने वाले मजदूर को एक मध्यमआकार के ध्वज के बदले 2० रुपए दिए जाते हैं। इन कारीगरों को मानक ब्यूरो द्बारा दिये गए आकार के हिसाब सेही तिरंगे बनाने पड़ते हैं। तिरंगा बनाने वाले कारीगर महीने में 16,००० रुपए के करीब कमा लेते है। जो प्रति दिन के अधिकृत मजदूरी से कहीं ज्यादा है।
 उस जगह काम कर रहे लोग यह मान कर काम नहीं करते है कि उन्हें पैसे कमाने हैं, बल्कि राष्ट्रीय ध्वज बनाने में वे गौरव महसूस करते हैं। झंडे की सिलाई विभाग में लगभग 25 लोग काम करते हैं जो कपडे को काटने, स्टीम प्रेसिग और छपाई का काम करते है। झंडा खादी का बनाया जाता है। खादी बुनने में केवल कपास, रेशम और ऊन का ही प्रयोग किया जाता है।
 इसकी बुनाई भी सामन्य बुनाई से भिन्न होती है। इस तरह की बुनाई अब दुर्लभ हो गई है। धारवाड़ के निकट गदग और कर्नाटक के बागलकोट में खादी की बुनाई की जाती है और 'हुबली' एकमात्र लाइसेंस प्राप्त संस्थान है जहां से झंडा उत्पादन व आपूर्ति की जाती है। बुनाई से लेकर बाजार में पहुंचने तक कई बार बीआईएस प्रयोगशालाओं में इसका परीक्षण होता है। बुनाई के बाद सामग्री को परीक्षण के लिए भेजा जाता है। कड़े गुणवत्ता परीक्षण के बाद उसे वापस कारखाने भेज दिया जाता है। इसके बाद उसे तीन रंगो में रंगा जाता है। बीच वाली पट्टी के ठीक मध्य में अशोक चक्र को काढ़ा जाता है। उसके बाद इसे फिर परीक्षण के लिए भेजा जाता है। बीआईएस झंडे की जांच करता है इसके बाद ही इसे बाजार में बेचने के लिए भेजा जाता है।

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