Saturday, 11 October 2014

मंगाइये, खाइये!

इस भागदौड़ भरी जिन्दगी को समय की चाल के साथ जोड़ने के लिए लोगों ने अपने स्वास्थ्य को नजरअंदाज कर दिया है, जिसका असर सीधे तौर पर उनके खान-पान के समय पर पड़ता है। पैक्ड फूड जल्दी खाने में और कई किस्म के पैक्ड खाने को झटपट बनाने का एक आसान विकल्प बन गया है। लेकिन वे पुराने दिन थे, जब किसी को खाना बनाने का मन न हो और वह भूखा रह जाए, या कोई पार्टी करनी हो तो वह सर का दर्द बन जाए। तकनीकी क्षेत्र में हुए बदलाव ने अपने साथ मनुष्य के रहन-सहन को भी बदल दिया है। जितनी जल्दी मनुष्य खाना बना नहीं सकता उतनी ही जल्दी अगर खाना उसके घर उम्दा पैकिंग के साथ आ जाए वह और भी महज एक फोनकॉल से। हां, अब यह मुमकिन है। लोगों ने इसे अपना समय बचाने की प्रक्रिया की तरह अपना भी लिया है।
 इस पेशे ने न केवल अपनी सुविधा लोगों तक पहुंचाई, बल्कि अपने व्यापार को एक हजार करोड़ तक भी पहुंचाया है। देश में कोई ऐसा रेस्टोरेंट नहीं है जो पैक्ड फूड घर वितरण न करता हो। छोटे से छोटे रेस्टोरेंट भी इस प्रणाली से आज अछूते नहीं हैं। बदलती ग्राहकों की पसंद और एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा में आगे रहने के लिए किफायती दरों पर वितरण प्रणाली की सुविधा देते हैं, इस पेशे से जुड़े जानकारबताते हैं कि इस तरह के विकल्प को लोग समय के साथ अपने जीवन में जोड़ते जा रहे हैं। यह प्रणाली पिछले कुछ सालों में बड़ी जनसंख्या का हिस्सा बन गई है और इसके कारोबार में बीते वक्त के साथ बढ़ोतरी हुई है। इंडिया मैकडी के अनुसार यह प्रणाली 3० से 4० प्रतिशत के पार हो जाएगी और लगभग छह सौ करोड़ की बढ़त बना लेगी। शहरों के विस्तार के साथ-साथ रहन-सहन में आए बदलाव ने लोगों के भोजन के तरीकों को भी बदल कर रख दिया है। इस प्रणाली के दो सार्थक कारक है एक तो स्पीड दूसरा खाने की गुणवत्ता। झटपट तैयार किया खाना और उसमें पांच तारा स्वाद। मोटे तौर पर इसमें 7०० से 8०० करोड़ का इजाफा हर एक साल होता है जो कि 15 से 2० प्रतिशत है। एक गृहिणी ने बताया की इस तरह की पैक्ड फूड की वस्तुएं पारिवारिक जीवन को आसान बना दिया है अब कुछ मिनटों में कई लोगों के लिए इडली-सांबर बना सकती हूं। वे खुद सप्ताह में करीब पांच दिन पैक्ड फूड का इस्तेमाल करते हैं।

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