Saturday, 11 October 2014

पल-पल आगे बढ़

देश-विदेश में एक समय किसी भी ऊंची और भव्य इमारत की पहचान उस पर लगी क्लॉकहाउस (घंटाघर) के जरिए हुआ करती थी, लेकिन बदलते समय के साथ-साथ इसके मायने भी बदल गए हैं। इसका अनोखा उदाहरण भारत के अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में देखने को मिला, जहां विक्टोरिया क्लॉकहाउस का उपयोग छात्रों को नियमित रूप से समय के सदुपयोग के लिए कराया जा रहा है। युवाओं के मार्गदर्शन के लिए नए-नए तरीकों से उनका ध्यान शिक्षा की ओर खींचा जा रहा है और यह तरीका भी उनमें से एक है। यह बच्चों में उत्पन्न होने वाले आलस्य और ज़िद्दीपन को कम करने में मदद कर रही है। कभी-कभी यह सवाल भी निकल के आता है कि क्या यह घंटाघर छात्रों के व्यवहार को बदलने में वाकई कारगर है। एएमयू से नामीगिरामी छात्रों की फेहरिस्त लंबी है, जैसे मोहम्मद अली, लियाकत अली खान, अब्दुल गफ्फार खान, शेख अब्दुल्ला, हामिद अंसारी, राजा राव, ख्वाजा अहमद अब्बास, अली सरदार जाफरी, शहरयार, ईश्वरी प्रसाद, मुशीरुल हसन, जहूर कासिम, मोनिस रजा, लाला अमरनाथ, जफर इकबाल, नसीरुद्दीन शाह, जावेद अख्तर और मुजफ्फर अली। यह सूची देखकर तो जवाब हां ही होना चाहिए।
 ब्रिटिश परोपकारी जोसफ बेक ने एएमयू के संस्थापक सर सैयद अहमद खान को 1891 में क्लॉकहाउस दान में दिया था। उन्होंने सोचा था कि वह समय के महत्व के बारे में भी अनिच्छुक छात्रों को समझा सकता है। क्लॉकहाउस को सेंट्रल एंट्री प्वाइंट पर लगाया गया इसके घंटे कीआवाज को एक किलोमीटर दूर तक सुना जा सकता है। यह स्पोर्ट्स, लाइब्रेरी, लेबोरेटरी और कक्षा में पढ़ रहे बच्चों को बतलाता है कि उनकी कक्षा का समय हो गया है और दूसरी कक्षा में जाने का समय आ गया है। माना जाता है कि ज्यादातर बच्चे अपने खाली समय को बिना कुछ किये ही बर्बाद कर देते हैं, जोकि काफी समय से कालेज प्रशासन के लिए समस्या थी। कहीं न कहीं कोई भूल है, और इस बात का एहसास था कि विश्वविद्यालय के शैक्षणिक काम में कुछ कमी है। ऐसा कोई तरीका चाहिए जो बच्चों को सही समय का मूल्यांकन कराए। इन्हीं सब बातों को देखते हुए कई बार एएमयू के कुलपति खराब घंटाघर पर चढ़कर मुआयना किया करते थे और फिर उसी दौरान उन्होंने सख्त कदम उठाते हुए पुराने घंटाघर को ठीक करवाने का फैसला किया। प्रोफ़ेसर इफ्तिखार आलम खान के अनुसार इस घंटाघर की कीमत 4००० रुपए (उस समय के हिसाब से) बताई गई, लेकिन आज के समय में इसकी असल कीमत चार लाख आंकी जाती है। इसको सही तरीके से लगाने में लगभग 3० साल लग गए थे, क्लॉक की टिक-टॉक का अलग महत्व बन गया था वहां पढ़ने वाले स्टूडेंटों के बीच, यह घड़ी निरंतर जताती रहती थी कि भविष्य को सुधारना है तो समय के एक-एक क्षण का सदुपयोग किया जाना चाहिए। इस तरह के व्यहवार को कार्यगत कराने के लिए लेफ्टिनेंट जनरल ज़मीरुद्दीन शाह कुलपति (वीसी) ने क्लॉकहाउस को ठीक कराने का जिम्मेदारी प्रो-वाईस-चांसलर ब्रिग. सैयद अहमद अली को दी और कुछ समय के बाद गुजरात के इंजीनियर की मदद से इससे बदल कर नया रूप दे दिया गया और पुराने विक्टोरिया क्लॉकहाउस के हिस्सों को विश्वविद्यालय के संग्रहालय में प्रदर्शनी के लिए रख दिया गया। यह क्लॉक दो भागों में है, आगे और पीछे, जिसकी आवाज दिन के समय 8०० गज की दूरी तक सुनाई पड़ती है और रात के समय बढ़ करएक किलोमीटर तक हो जाती है।

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