बिहार के भागलपुर शहर की -
-कुम्हारों की जिंदगी को रोशनी कां इंतजार
-गंगटी मोहल्ले के 40 परिवार मिट्टी के बरतन व दीये बना कर कर रहे गुजारा
- दीये पर भी पडे़गी महंगाई की मार, चाइनीज झालरों की मांग बढ़ी
लाल मिट्टी 800 से 1000 अब प्रति टेलर
काली मिट्टी 1200 से अब 1500 प्रति टेलर
अंजू अपने पिता मुरारी पंडित के नक्शेकदम पर कुम्हार का काम तो सीख लिया, लेकिन उसे अब यह चिंता सता रही है कि बाजार में मिट्टी के दीये के व्यापारी मिल पाएंगे कि नहीं। ऐसे तो उसकी बड़ी बहन अर्चना भी उसकी मदद करती है। मिट्टी के बर्तन तैयार करने व महंगाई की मार ने दोनों बहनों को कमजोर कर दिया है।
बाजार में उत्सवी माहौल है। लेकिन इन उत्सवों में कुम्हारों के दीयों की जगह छोटी-बड़ी मोमबत्ती ने या फिर चाइनीज झालरों ने ले ली है। शहर के अलीगंज स्थित ऊपर गंगटी मोहल्ले में ऐसे 40 घर हैं जहां के लोग अपनी रोजी-रोटी के लिए मिट्टी के दिये व बर्तन बर्तन बनाते हैं।
दिन-रात मेहनत करने वाले कुम्हार का परिवार मिट्टी के व्यवसाय में महीनों लगा रहता है उसके बावजूद उसे उसकी मेहनत का वाजिब दाम मिल नहीं मिल पाता है। बदलते समय, तकनीक की मार और महंगाई के चलते लोग अब मिट्टी के दीये उतने पसंद नहीं करते हैं जितना कि चायनीज झालर और मोमबत्ती। दीपावली के त्योहार पर सिर्फ शगुन के रूप में मिट्टी के दिये टिमटिमाते नजर आते हैं।
एक टेलर मिट्टी की कीमत अब 800 से बढ़कर 1000 रुपये
32 वर्षीय निरंजन पंडित का कहना है कि किसी तरह पेट पल जाता है। लेकिन साल भर घर कैसे चलाएं यह चिंता परेशान करती है। कहने के लिए तो सरकार हर तरह के उद्योग को प्रोतसाहन देती है लेकिन केवल 18 साल पहले चाक ही सरकार की तरफ से मिला उसके बाद कुछ नहीं। जैसे मिट्टी का रेट बढ़ता है वैसे ही हम कुम्हारों पर महंगाई की मार पड़ती है। एक ट्रेलर मिट्टी की कीमत अब 800 से बढ़कर 1000 हो गयी है। कुसुम देवी मिट्टी से बनी कई कलाकृतियां बनाती हैं। वह बताती हैं कि कई बार लोगों ने समझाया कि कुछ और काम कर लो, लेकिन वह कहती हैं कि यह उनका पुश्तैनी पेशा है। दिन-रात मेहनत के बाद हमें मजदूरी के रूप में 150 से 200 रुपये की ही कमाई हो पाती है।
-महंगी मिट्टी के साथ दीये के दाम भी बढ़े
2014 2015
छोटे मिट्टी के दीये - एक रुपये प्रति पीस डेढ़ से दो रुपये
बड़े मिट्टी के दीये - चार से छह प्रति पीस सात से आठ प्रति पीस
छोटे रंग और डिजाइन दार दीये- दो से तीन प्रति पीस ढ़ाई से चार
बड़े रंग और डिजाइन दार दीये - पांच से आठ प्रति पीस छेह से दस प्रति पीस
-कुम्हारों की जिंदगी को रोशनी कां इंतजार
-गंगटी मोहल्ले के 40 परिवार मिट्टी के बरतन व दीये बना कर कर रहे गुजारा
- दीये पर भी पडे़गी महंगाई की मार, चाइनीज झालरों की मांग बढ़ी
लाल मिट्टी 800 से 1000 अब प्रति टेलर
काली मिट्टी 1200 से अब 1500 प्रति टेलर
अंजू अपने पिता मुरारी पंडित के नक्शेकदम पर कुम्हार का काम तो सीख लिया, लेकिन उसे अब यह चिंता सता रही है कि बाजार में मिट्टी के दीये के व्यापारी मिल पाएंगे कि नहीं। ऐसे तो उसकी बड़ी बहन अर्चना भी उसकी मदद करती है। मिट्टी के बर्तन तैयार करने व महंगाई की मार ने दोनों बहनों को कमजोर कर दिया है।बाजार में उत्सवी माहौल है। लेकिन इन उत्सवों में कुम्हारों के दीयों की जगह छोटी-बड़ी मोमबत्ती ने या फिर चाइनीज झालरों ने ले ली है। शहर के अलीगंज स्थित ऊपर गंगटी मोहल्ले में ऐसे 40 घर हैं जहां के लोग अपनी रोजी-रोटी के लिए मिट्टी के दिये व बर्तन बर्तन बनाते हैं।
दिन-रात मेहनत करने वाले कुम्हार का परिवार मिट्टी के व्यवसाय में महीनों लगा रहता है उसके बावजूद उसे उसकी मेहनत का वाजिब दाम मिल नहीं मिल पाता है। बदलते समय, तकनीक की मार और महंगाई के चलते लोग अब मिट्टी के दीये उतने पसंद नहीं करते हैं जितना कि चायनीज झालर और मोमबत्ती। दीपावली के त्योहार पर सिर्फ शगुन के रूप में मिट्टी के दिये टिमटिमाते नजर आते हैं।एक टेलर मिट्टी की कीमत अब 800 से बढ़कर 1000 रुपये
32 वर्षीय निरंजन पंडित का कहना है कि किसी तरह पेट पल जाता है। लेकिन साल भर घर कैसे चलाएं यह चिंता परेशान करती है। कहने के लिए तो सरकार हर तरह के उद्योग को प्रोतसाहन देती है लेकिन केवल 18 साल पहले चाक ही सरकार की तरफ से मिला उसके बाद कुछ नहीं। जैसे मिट्टी का रेट बढ़ता है वैसे ही हम कुम्हारों पर महंगाई की मार पड़ती है। एक ट्रेलर मिट्टी की कीमत अब 800 से बढ़कर 1000 हो गयी है। कुसुम देवी मिट्टी से बनी कई कलाकृतियां बनाती हैं। वह बताती हैं कि कई बार लोगों ने समझाया कि कुछ और काम कर लो, लेकिन वह कहती हैं कि यह उनका पुश्तैनी पेशा है। दिन-रात मेहनत के बाद हमें मजदूरी के रूप में 150 से 200 रुपये की ही कमाई हो पाती है।
-महंगी मिट्टी के साथ दीये के दाम भी बढ़े
2014 2015
छोटे मिट्टी के दीये - एक रुपये प्रति पीस डेढ़ से दो रुपये
बड़े मिट्टी के दीये - चार से छह प्रति पीस सात से आठ प्रति पीस
छोटे रंग और डिजाइन दार दीये- दो से तीन प्रति पीस ढ़ाई से चार
बड़े रंग और डिजाइन दार दीये - पांच से आठ प्रति पीस छेह से दस प्रति पीस
बहुत अच्छी मर्मस्पर्शी आलेख प्रस्तुति हेतु धन्यवाद!
ReplyDeleteनव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं!
आप को भी नव वर्ष की शुभकामना
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