Wednesday, 8 June 2016

स्मार्ट सिटी भागलपुर में जुगाड़ फैला रहे जहर

भागलपुर शहर स्मार्ट सूची में अपना नाम दर्ज करा चुका है लेकिन इसके स्मार्ट बनने में अभी काफी वक्त लगेगा। शहर में दस हजार जुगाड़ गाड़ियां हवा में काला जहर फैला रही हैं। जनरेटर से चलने वाली गाड़ियां आम वाहनों के मुकाबले कई गुना ज्यादा कार्बन मोनो ऑक्साइड छोड़ती है, जो पर्यावरण और जिंदगी के लिए बेहद खतरनाक है। यदि इसे नहीं रोका गया तो ये जिले के पर्यावरण में जहर घोल देगी। हैरत यह कि डीएम और कमिश्नर ने एक जून से इसके परिचालन पर रोक लगाने की बात कही थी लेकिन इस दिशा में कुछ नहीं हुआ।

केंद्र सरकार की फ्यूल पालिसी रिपोर्ट के मुताबिक आम गाड़ियों से पर्यावरण को सिर्फ छह प्रतिशत नुकसान होता है, जिसकी भरपाई तीन पौधे लगाने से हो जाता है। जुगाड़ से होनेवाले प्रदूषण को लेकर पर्यावरणविद् कई बार गंभीर चिंता जाहिर कर चुके हैं। पर्यावरण के जानकार बताते हैं कि अरविंद मिश्रा बताते हैं कि जुगाड़ गाड़ियां से निकलनेवाले धुआं से पर्यावरण में काला जहर फैलता है। शहर में लगे पेड़-पौधे भी इस प्रदूषण को एक बार में खत्म करने में नाकाम साबित हो जाते हैं। अगर इसके बगल से गुजरें या इसका धुआं लग जाए तो जी मिचलाने लगता है।
कार्बन मोनो आक्साड के अलावा यह ध्वनि प्रदूषण भी करती है। ये गाड़ियां बिना साइलेंसर के चलती हैं, जिससे काफी तेज आवाज होती है। कार्बन मोनो ऑक्साइड के अलावा कार्बन डाइऑक्साइड भी इससे काफी अधिक मात्रा में निकलती है। आम गाड़ियों के मुकाबले दस प्रतिशत अधिक कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन जुगाड़ से होता है।

कैंसर की बीमारी भी बांट रही
जुगाड़ गाड़ी लोगों में कैंसर की बीमारी भी बांट रही है। वरिष्ठ चिकित्सक डॉ हेमशंकर शर्मा ने बताया कि सांस की बीमारी और फेफरे का कैंसर जुगाड़ की धुओं से हो रहा है। हर रोज क्रानिक ब्रोकोलाइटिस के मरीज उनके यहां पहुंचते हैं। धुआं के फेफड़े में जाते ही वहां संक्रमण हो जाता है, जिससे मरीज को सांस लेने में दिक्कत हाती है। शरीर फूलने लगता है। कुछ दिन बाद फेफड़े सिकुड़ने लगते हैं और कैंसर की बीमारी हो जाती है। ऐसे कई मामले उनके पास आ रहे हैं।

राजस्थान और गुजरात में होता है रजिस्ट्रेशन
देश के दूसरे राज्यों में भी जुगाड़ गाड़ियां चलती हैं। लेकिन वहां उनकी जांच होती है। प्रदूषण नियंत्रण का सर्टिफिकेट लेना पड़ता है। वहां गाड़ियों के पीछे नंबर प्लेट भी लगे रहते हैं। राजस्थान और गुजरात में जुगाड़ गाड़ी तभी बाहर निकाली जा सकती है, जब वह पूरी तरह से ठीक हो।

किसी गाड़ी से कितना प्रदूषण
कार 3 प्रतिशत
ट्रक  8 प्रतिशत
टैक्टर 6 प्रतिशत
बस  8 प्रतिशत
बाइक डेढ़ से दो

Tuesday, 3 November 2015

मिट्टी के दीये को लगी महंगाई की नजर

बिहार के भागलपुर शहर की -
-कुम्हारों की जिंदगी को रोशनी कां इंतजार
-गंगटी मोहल्ले के 40 परिवार मिट्टी के बरतन व दीये बना कर कर रहे गुजारा
- दीये पर भी पडे़गी महंगाई की मार, चाइनीज झालरों की मांग बढ़ी
लाल मिट्टी 800 से 1000 अब प्रति टेलर
काली मिट्टी 1200 से अब 1500 प्रति टेलर 

अंजू अपने पिता मुरारी पंडित के नक्शेकदम पर कुम्हार का काम तो सीख लिया, लेकिन उसे अब यह चिंता सता रही है कि बाजार में मिट्टी के दीये के व्यापारी मिल पाएंगे कि नहीं। ऐसे तो उसकी बड़ी बहन अर्चना भी उसकी मदद करती है। मिट्टी के बर्तन तैयार करने व महंगाई की मार ने दोनों बहनों को कमजोर कर दिया है।
बाजार में उत्सवी माहौल है। लेकिन इन उत्सवों में कुम्हारों के दीयों की जगह छोटी-बड़ी मोमबत्ती ने या फिर चाइनीज झालरों ने ले ली है। शहर के अलीगंज स्थित ऊपर गंगटी मोहल्ले में ऐसे 40 घर हैं जहां के लोग अपनी रोजी-रोटी के लिए मिट्टी के दिये व बर्तन बर्तन बनाते हैं।
दिन-रात मेहनत करने वाले कुम्हार का परिवार मिट्टी के व्यवसाय में महीनों लगा रहता है उसके बावजूद उसे उसकी मेहनत का वाजिब दाम मिल नहीं मिल पाता है। बदलते समय, तकनीक की मार और महंगाई के चलते लोग अब मिट्टी के दीये उतने पसंद नहीं करते हैं जितना कि चायनीज झालर और मोमबत्ती। दीपावली के त्योहार पर सिर्फ शगुन के रूप में मिट्टी के दिये टिमटिमाते नजर आते हैं।
एक टेलर मिट्टी की कीमत अब 800 से बढ़कर 1000 रुपये
32 वर्षीय निरंजन पंडित का कहना है कि किसी तरह पेट पल जाता है। लेकिन साल भर घर कैसे चलाएं यह चिंता परेशान करती है। कहने के लिए तो सरकार हर तरह के उद्योग को प्रोतसाहन देती है लेकिन केवल 18 साल पहले चाक ही सरकार की तरफ से मिला उसके बाद कुछ नहीं। जैसे मिट्टी का रेट बढ़ता है वैसे ही हम कुम्हारों पर महंगाई की मार पड़ती है। एक ट्रेलर मिट्टी की कीमत अब 800 से बढ़कर 1000 हो गयी है। कुसुम देवी मिट्टी से बनी कई कलाकृतियां बनाती हैं। वह बताती हैं कि कई बार लोगों ने समझाया कि कुछ और काम कर लो, लेकिन वह कहती हैं कि यह उनका पुश्तैनी पेशा है। दिन-रात मेहनत के बाद हमें मजदूरी के रूप में 150 से 200 रुपये की ही कमाई हो पाती है।

-महंगी मिट्टी के साथ दीये के दाम भी बढ़े
                                               2014                                                       2015
छोटे मिट्टी के दीये   -           एक रुपये प्रति पीस                               डेढ़ से दो रुपये
बड़े  मिट्टी के  दीये   -          चार से छह प्रति पीस                        सात से आठ प्रति पीस
छोटे रंग और डिजाइन दार दीये- दो से तीन प्रति पीस                          ढ़ाई से चार
बड़े  रंग और डिजाइन दार दीये -  पांच से आठ प्रति पीस                   छेह से दस प्रति पीस





Friday, 25 September 2015

पुल निर्माण पर बटोर ले जाते हैं,नेता वोट

-श्रीरामपुर गांव में पानी,बिजली और सड़क गायब
-न सप्लाई पानी है,न चलने लायक सड़क
-500घरों में से केवल 20 प्रतिशत घर में शौचालय

बिहार के भागलपुर जिला के नाथनगर प्रखंड की रत्तीपुर बोरिया पंचायत के श्रीरामपुर गांव की 3 हजार की आाादी आज भी पक्के सड़क,साफ पानी और शौचालय को तरस रही है। आजादी से अब तक श्रीरामपुर गांव में आने-जाने के लिए आ तक पक्की सड़क नहीं बनी। हालांकि चुनाव से पहले सासंद और विधायक आते-जाते रहे और पुलानाने,गांव का विकास के वायदे करते रहे, लेकिन आज तक सिर्फ आश्वासन भर ही मिला है। आज भी गांव में जाने के लिए केवल कच्ची सड़क है,जो बरसात होते ही चलने लायक नहीं रहती । गांव को शहर से जोड़ने वाली एक चचड़ी पुल है वह भी भगवान भरोसे है। जमुनिया नदीं में बारिश के दिनों में जल स्तर बढ़ने के साथ ही लोगों का शहर से संपर्क टूट जाता है।

-500घरों में से केवल 20 प्रतिशत घर में शौचालय
लोकसभा हो या विधानसभा चुनाव, लंबे-चौडे़ वादे कर नेताजी वोट तोाटोर ले जाते है,लेकिन चुनाव के बाद कोई हालचाल जानने तक नहीं पहुंचता। आ फिर चुनाव आते ही नेताओं के साथ उनके सहयोगियों का जामड़ा लगना शुरू हो गया है लेकिन विकास कीाात आते ही नेता मुंह छुपाने लगते हैं।
500 घरों की 3हजार आाादी वाला श्रीरामपुर गांव सड़क के साथ विकास की दूसरीाुनियादी जरूरतों से भी वंचित है। गांव के मात्र 20 प्रतिशत घरों में ही शौचालय  है। जाकि 80 प्रतिशत लोगों को घरों सेााहर शौच के लिए जाना पड़ता है। गांव में कईाार आपत्ति जनक घटनाएं हो चुकी हैं। महिलाओं को काफी परेशानियां उठानी होती है।

श्रीरामपुर की राजनीति पुल से शुरू होती है और पुल पे खत्म । लेकिन पुल का काम काभी नहीं हो पाया है। विमलकांत यादव,गुडेस यादव,रामचरण यादव,प्रकाश यादव,मुकेश यादव,दिनेश यादव,गौरव कुमार, सक्लदिव कुमार ने बताया कि पुल स्वीकृत होने के बावजूद निर्माण अधर में है। हमारे विधायक नेताजी-जनप्रतिनिधि जो एक बार चुनाव जीत कर गए,सो उनका कोई अता-पता नहीं है।  चुनाव के समय एक भरोसा रहता है कि कही इसाार पुरान जाए जिससे नाथनगर से दूरी गांव की कम हो जाएगी लेकिन चुनाव के साथ नेताजी के वादे भी अगली बार के लिए टल गए। नाला बना तो लगा कि सड़क भी बन जाएगी लेकिन नाला टूुटने पर है, पर पक्की सड़क का कोई चर्चा ही नहीं। लोगों को नाथनगर जाने के लिए 7 कि.मी घूम के जाना पड़ता है। शाम साताजे केााद ऑटो की आवाजाही भीांद हो जाती हैं। ग्रामीणों ने चर्चा कि चुनाव से पहले कुछ नेता आये  जिन्होंने  पुल निर्माण का दिया भरोसा सुबोध राय,सुशिल मोदी,शाहनवाज हुसैन,बूलो मंडल लेकिन महीने, साल दर साल बीता पुल नहीं बना ।

Monday, 14 September 2015

बड़ी चुनौती है हिंदी का प्रसार

-हिंदी को बचाएं
-पाठ्यक्रम से लेकर आम बोलचाल में भी है अंग्रेजी का बोलबाला
-भागलपुर की 40 प्रतिशत आबादी की भाषा में भी हुआ परिर्वतन

अंग्रेजी के असर ने बड़े शहरों के साथ-साथ छोटे शहरों के युवाओं पर भी अपनी छाप छोड़ता जा रहा है। इसका एक कारण है पढ़ाई के साथ जीवन स्तर में समय के अनुसार बदलाव। जानकारों की मानें तो शिक्षा क्षेत्र में भी अंग्रेजी पर ही जोर दिया जा रहा है और बोचलाल भी बदलती जा रही है। ऐसे में एक प्रश्न बनकर उभर रहा है कि भागलपुर की 40 प्रतिशत की आबादी की भाषा में अचानक परिर्वतन देखने को कैसे मिल रहा है।

कोई हिंदी के लिए लड़ रहा तो कोई अंग्रेजी सीखने के लिए
हिंदी-अंगे्रजी के भेद ने आज दो तबकों को भीड़ में खड़ा कर दिया है। एक जो अपने अस्तित्व को बचाने के लिए लड़ रहा है और दूसरा जो अंग्रेजी सीखने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहा है। लेकिन, काबीलियत की होड़ हर तरफ एक जैसी बनी हुई है। जात-पात को पीछे छोड़ भाषा की लड़ाई एक तरफ चल रही है और दूसरी तरफ भाषा के भेदभाव में हिंदी को आखिरी पायदान पर धकेल दिया गया है।

युवाओं की राय-
जिस रफ्तार से हिंदी विलुप्त होती जा रही है, उससे लगता है कि अंग्रेजी शासन का यह दूसरा अध्याय है। किसी भी पाठ्यक्रम में हिंदी को महत्व नहीं दिया जा रहा है।
- देवकांत, इंजीनियरिंग के छात्र
हिंदी तो हमारे रग-रग में है, लेकिन शिक्षा क्षेत्र और युवाओं की बोलचाल में यह खत्म सी हो गई है। इसका एक कारण शिक्षा स्तर का बदलाव भी है।
- कुणाल, बीए के छात्र
- जिस प्रकार से हिंदी को खत्म किया जा रहा, वह चिंता का विषय है। पढ़ाई से लेकर बोलचाल तक को अंग्रेजी प्रभावित कर रही है। इसलिए जागरूकता जरूरी है।
- दीपक, 11वीं के छात्र
एक तरफ हिंदी खत्म होती जा रही है, लेकिन दूसरी तरफ हिंदी को भी परीक्षा के प्रश्नप्रत्र में और जटिल बनाकर पेश किया जा रहा है। इसे रोकने पर भी ध्यान देना होगा।
- सौरव, बीए के छात्र

Thursday, 11 June 2015

निजी कंपनियों के जिम्मे दिल्ली बिजली बोर्ड..

दिल्ली में प्रचंड गर्मी के बीच जारी बिजली संकट की मार झेल रही दिल्ली की जनता काफी परेशान और हताश है। निजीकरण के समझौते को तकरीबन 12 साल हो गए, लेकिन सरकार अपने वायदें पर कहीं भी खरी नही उतरी, आए दिन ओवर लोड के वजह से ट्रांसफोर्मर जल रहे हैं या उनका फ्यूज उड़ जाता है और कहीं पावर स्टेशन काम करना बंद कर देता है।
गर्मी आते ही इस प्रकार की दिक्कतें हो जाती हैं और समय के लम्बे अंतराल के बाद यह परेशानी काफी बढ़ गई। दिल्ली शहर बिजली कटौती से परेशान हो चला है। 2002 में यह अहम फैसला लेते हुए बिजली का निजीकरण कर दिया गया, इस निजीकरण ने संसद से लेकर सड़कों पर उथल-पुथल मचा दी। विपक्ष में बैठी सरकार ने तो इस निर्णय पर अपना विरोध प्रर्दशन वॉकआउट के रूप में किया।
सरकार आम जनता से कुछ एक लुभावने वायदें करने लगी। जिससे जनता को यह निजीकरण का फैसला सही लगे। घाटे में चल रही बिजली अगर निजी हाथों में सौंप दी जाए, तो यह एक बेहतर विकास का उम्दा कदम होगा। इसी को देखते हुए दिल्ली में आपूर्ति का ज़िम्मा दो निजी कंपनियों को दिया गया। जिसमें एक यमुना पावर और दूसरी टाटा पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी हैं।
निजी कंपनियों के आने के बाद विद्युत की आपूर्ति में सुधार ज़रूर हुआ, मगर इससे बिजली महंगी होती चली गई। निजी कंपनियों का तर्क है कि वो महंगी दर पर बिजली ख़रीद रही हैं, इसलिए बिजली के दर बढ़ानी पड़ी है। सरकार ने तो ऐसे वादे आम जनता के समक्ष रखे, जिससे लगने लगा की अब बिजली की दरें पहले की दरों से काफी कम और वितरण प्रणाली काफी हद तक दुरुस्त होंगी और 24 घन्टे बिजली का वितरण रहेगा। यानि दिल्ली में कोई अंधकार के साये में नही रहेगा।
यह निजीकरण का फैसला सरकार पर ही भाड़ी पड़ता नजर आने लगा। क्या यह निर्णय सोच समझ कर लिया गया फैसला था और क्या सरकार ने इस फैसले में कहीं जल्दबाजी तो नहीं दिखाई। सरकार ने यह फैसला ले तो लिया, मगर निजी कंपनियों को मालिकाना हक दे देने से क्या बिजली आज के परिदृश्य में सही रूप से संचालित और बेहतर परिणाम दे पा रही है।
सरकार संसाधन को बेहतर कार्य रूप बनाने के बजाए अब आम जनता से अपील करने पर उतर आई की। दिल्ली में प्रचंड गर्मी के बीच जारी बिजली संकट से निपटने के लिए लेफ्टिनेंट गवर्नर नजीब जंग ने कुछ खास दिशा निर्देश जारी किए हैं। इसके तहत शॉपिंग मॉल्स को रात 10 बजे के बाद बिजली नहीं मिलेगी।
साथ ही सरकारी दफ्तरों, स्कूल-कॉलेजों और लोगों से एसी कुछ घंटे न चलाने की अपील की गई है। लेफ्टिनेंट गवर्नर नजीब जंग ने रविवार को दिल्ली में बिजली संकट को लेकर बैठक की। इस बैठक में उन्होंने रात 10 बजे के बाद शॉपिंग मॉल्स को बिजली न देने के निर्देश दिए। इसके साथ ही स्कूल-कॉलेजों से अपील की गई है कि वे बिजली बचाने के लिए दोपहर 3.30 से 4.40 बजे के बीच एसी न चलाएं।
मध्य प्रदेश सरकार ने दिल्ली को रात के समय बिजली देने का प्रस्ताव दिया है। पत्र में बताया गया है कि वर्तमान में मध्य प्रदेश द्वारा दिल्ली को 231.5 मेगावाट बिजली की आपूर्ति की जा रही है। बिजली संकट के समाधान के लिए मध्य प्रदेश दिल्ली को अतिरिक्त बिजली देने के लिए तैयार है।

Monday, 8 June 2015

‘विकास के इमारत पर भारत’

स्कूली शिक्षा के दौरान आपने विकास के कई रूप देखें होंगे।मगर विकास का आकलन करने  की कोई निश्चित तय पैमाना नहीं है। विकास वह साधन है जो किसी-न-किसी रूप में एक बड़े आबादी को प्रभावित करती है।कभी सड़क के नाम पर तो कभी बिजली के नाम पर या फिर स्कूल और अस्पताल के नाम पर।
भारत  अभी तकनीक के क्षेत्र में अपने पाँव पसार रहा है, बढ़ती टेक्नोलॉजी शहर के साथ-साथ गांव को भी कदम से कदम मिलाने की सीख दे रही हैं।
हाल के दिनों में ग्रामीण इलाकों में मोबाइल और इनटरनेट प्रयोग की  होड़ लगी है। सरकारी आकड़ों के मुताबिक गांवों में सूचना प्रोधोगिकी के बढ़ाव से कृषि,भूमि-अभिलेख और सार्वजनिक वितरण प्रणाली एक नए मुकाम पर पहुंच गए है,जिसे हम जमीनी धरातल पर भी महसूस कर सकते हैं ।  सूचना प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से शासन तक आम आदमी की पहुंच आसान हो गई है।
पारदर्शी प्रशासन लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूती प्रदान करती है। एक इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन एकत्रीकरण एवं विश्लेषण वेब साईट के अनुसार 3.5 अरब इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन 2014 में दर्ज की गई। फिछले साल के मुकाबले 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की। सूचना प्रोधोगिकी ने सकारात्मक रूप से सामाजिक स्तर को बढ़ावा दिया।
वास्तविक जगत समय में हुए कुल इ-टाल संगणक आधारित व्यवहारों ई-ट्रांजेक्शनस, जो की भारतीयों और केन्द्रीय और राज्य सरकारों के 2,848 संगठनों और विभागों के बीच हुए | 29 सेवा क्षेत्र हैं जिनमें भूमि दस्तावेज, कृषि, सूचना, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिलों के और बिजली पेमेंटआदि शामिल हैं |
ई- सेवाओं के इस्तेमाल का यह मतलब नहीं है कि उनकी वर्तमान गुणवत्ता वहीहै जो कि वास्तव में होना चाहिए, लेकिन कंप्यूटर और मोबाइल सहाए आधारितआंकड़े भारतीय किसानों और विभिन्न सरकारों के बीच हुए संदेशों के आदानप्रदान के अभिनव रिकार्ड्स हैं |एक ई- ट्रांजेक्शन एक सरकारी प्रेषण सेवा है जो कि कंप्यूटर के माध्यम से दी जाती है|उदहारण के स्वरूप एक आर टी आई  का मतलब सूचना का अधिकार के नियम के अंतर्गत किया गया कोई प्रश्न, कार्मिक और ट्रेनिंग विभाग (डी.ओ.पी.टी) की वेबसाइटwww.rtionline.gov.in या कोई किसान मौसम सम्बन्धी जानकारी अगर मोबाइल सन्देश(एस.एम.एस) के जरिये वेबसाइट से प्राप्त करता है तो उसके इस सन्देश ग्रहण करने के कार्य को ई- ट्रांजेक्शन कहा जाता है |
विश्लेषण से पता चला है कि भारतीय किसान ई- सेवाओं के द्वारा ज्यादा तर जानकारियां मौसम सम्बन्धी, लैंड रिकार्ड्स की फोटोकॉपी या फसलों की वर्तमान कीमतों और पी.डी.एस द्वारा जारी किये गए छूट प्रदत्त खाद्य कूपन प्राप्त करने के लिए करते हैं | ई- सेवाओं के इस्तेमाल का यह मतलब नहीं है कि उनकी वर्तमान गुणवत्ता वही है जो कि वास्तव में होना चाहिए, लेकिन कंप्यूटर और मोबाइल सहाए आधारित आंकड़े भारतीय किसानों और विभिन्न सरकारों के बीच हुए संदेशों के आदान प्रदान के अभिनव दर्ज हैं | एक ई- ट्रांजेक्शन एक सरकारी प्रेषण सेवा है जो कि कंप्यूटर के माध्यम से दी जाती है| एक उदहारण की मदद से समझा जा सकता है एक आर टी आई यानी की सूचना के अधिकार के नियम के अंतर्गत किया गया कोई प्रश्न, कार्मिक और ट्रेनिंग विभाग डी.पी.टी की वेबसाइटwww.rtionline.gov.in या फिर कोई किसान मौसम सम्बन्धी जानकारी अगर मोबाइल सन्देश के जरिये वेबसाइट से प्राप्त करता है तो उसके इस सन्देश ग्रहण करने के कार्य को ई- ट्रांजेक्शन कह सकते है | हमारे विश्लेषण से पता चला है कि भारतीय किसान ई- सेवाओं के द्वारा ज्यादा तर जानकारियां मौसम सम्बन्धी, लैंड रिकार्ड्स की फोटोकॉपी या फसलों की बाजार में वर्तमान कीमतों और पी.डी.एस द्वारा जारी किये गए छूट प्रदत्त खाद्य कूपन प्राप्त करने के लिए करते हैं |भारत में आंध्र प्रदेश ने सबसे ज्यादा ई- गवर्नेंस की संख्या में विस्तार किया गया है – जिसमें उसने 224 ई-सेवाएँ , उसके बाद तेलंगाना 186 और गुजरात ने 181 ई- सेवाओं का विस्तार किया | ग्रामीण ई-प्रबंधन और सेवा के क्षेत्रों में उक्त ज्यादा सेवाएँ होने का मतलब है कि किसी स्तर पर ई- सेवा क्षेत्र में ज्ञान की कमी है- परिणाम स्वरुप बहुत सी ई-गवर्नेंस योजना यें असफल हो गयी | कुछ हद तक सरकारी ई-गवर्नेंस केप्रोजेक्ट्स असफल होने के प्रमुख कारणों में से एक है कि उनको बिना समुचित , “बेक-एंड सपोर्ट” के बिना ही बनाया गया , जिसके कारण ग्रामीण उपभोक्ताओं को काफी निराशा का सामना करना पड़ा। ई- ट्रांजेक्शन की संख्या 3.5 बिलियन होने का यह मतलब नहीं की ई-गवर्नेंस के सभी मानक सही ढंग से काम कर रहे हैं |राज्य सरकारों की ई- गवर्नेंस परियोजनों को छोडकर लगभग 20 मिशन परियोजनाएं हैं जो कि राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस प्लान के तहत पहली बार वर्ष 2004-5 में बने, उनमे से एक प्रोजेक्ट एमसीए 21 है यह ऐसा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म है जिस पर वैधानिक तौर पर सभी सार्वजनिक औरनिजी कम्पनियों को अपने वित्तीय और शेयर धारकों से सम्बंधित सूचना अपलोड कर सकते हैं।